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Showing posts from November, 2022

कुरआन का गलत तर्जमा किया

*"मुसलमानो! हक पहचानो!"*_                          _*🔖पोस्ट नम्बर 18*_        _*📗कुरआन का गलत तर्जमा किया 📗*_                         _*देवबंदियों ने*_ _*✒️एक जुबान से दूसरी जुबान में तर्जमा करना मामूली काम है लेकिन किसी जुबान की फसाहत व बलागत, सलासत व मानवीयत, मुहावरे, अंदाजे खिताब और शब्दों के अर्थ में हुए बदलावों को समझना फिर तर्जमा करना उतना ही मुश्किल काम है।*_  _*✒️आइए इसे एक छोटे से उदाहरण से समझें- फारसी भाषा में किसी आदमी को "मेहतर" कहना उसकी इज्जत बढ़ाना है क्योंकि फारसी भाषा में इसका अर्थ है "सरदार" लेकिन यही इज्जत वाला शब्द हमारे यहाँ गाली है।*_ _*🔥लेकिन आज देवबंद के मौलानाओं ने कुरआन का जो तर्जमा किया उसमें ढेरों गलतियाँ हैं कि जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया।*_  _*🔥देवबंदियों के तर्जमे अल्लाह और उसके रसूल की तौहीन से भरे पड़े हैं। देवबंदियों ने ऐसे तर्जमे किये कि जिसकी वजह से हराम चीज़ हलाल हो गई और हलाल चीज़ हराम ह...

*नबी को "हम जैसे बशर' बोलने की बीमारी*

*"मुसलमानो! हक पहचानो!"*_                         *🔖पोस्ट नम्बर 17*_      _*नबी को "हम जैसे बशर' बोलने की बीमारी*_ _*🔥आज वहाबियों/  देवबंदियों/ तबलीगियों की वजह से ये बीमारी आम हो चुकी है कि जिसे बोलने का भी शऊर नहीं वो भी बोल देता है कि रसूलुल्लाह हमारी तरह बशर थे। ज्यादा से ज्यादा ऐसे हैं जैसे हमारे बड़े भैय्या। नबी को बस इतनी इज्जत दो जैसे बड़े भाई को देते हो। या नबी को इस तरह समझो जैसे किसी गाँव का चौधरी। मुसलमानो, ये तो थी देवबंदियों, वहाबियों, तबलीगियों की नापाक जहनियत।।*_ _*✒️क्या है सुन्नी मुसलमानो का अकीदा नबी और रसूल के बारे में ?*_ _*✒️नबी इन्सान ही होते हैं। मर्द (Male) को नबी बनाया जाता है। जिन्न, फरिश्ते. औरत में से कोई नबी नही बन सकता।*_ _*✒️अल्लाह ने नबी को इन्सानों के बीच इन्सानी शक्ल सूरत में ही भेजा है। लेकिन नबी का दर्जा आम इन्सानों से बहुत ऊँचा है इसलिए नबी को आम बोल चाल में बड़े भाई या हम जैसा बशर या गाँव का चौधरी कहना शैतान इबलीस का तरीका है।*_  _*✒️इसी तरह यह कहना कि "हममे...

❌इकामत में पहले खड़े होने की बीमारी*_

 ❌इकामत में पहले खड़े होने की बीमारी*_ _*✒️आज वहाबियों/ देवबंदियों के इस फितने की वजह से मस्जिदों के अन्दर लड़ाई मची है कि जब इकामत कही जाती है तो कुछ लोग बैठे हैं तो कुछ लोग खड़े हैं। देवबंदियत के जाल में फंसे बेवकूफ देवबंदी बैठे हुए सुन्नियों को घूरते हैं और सुन्नी इन जाहिल देवबंदियों को घूरते हैं गोया कि एक रस्साकशी का माहौल बन जाता है। अखिर सच्चाई क्या है ?*_ _*इकामत में हय्यअललफलाह पर खड़े होने का सुबूत👇*_ _*✒️पहला सुबूत:- आका ﷺ फरमाते है जब इकामत कही जाए तो मत खड़े हो यहाँ तक कि मुझे देख लो।*_ _*📕हवाला-बुखारी शरीफ, जिल्द 1 पेज नं. 88*_ _*✒️दूसरा सुबूत:- यह हदीस मिश्कात शरीफ के जिल्द 1 पेज 67 पर है।*_ _*✒️तीसरा सुबूत:- यही हदीस मुस्लिम शरीफ जिल्द 1. पेज 220 पर है।*_ _*✒️चौथा सुबूत:- मुस्लिम शरीफ की इस हदीस की शरह में इमाम नूई अलैहिर्रहमा फरमाते हैं यानी इमामे आज़म (अबू हनीफा) और उलमाए कौफ ने फरमाया कि जब हय्यअलस्सलाह कहे तब सब लोग खड़े हों।*_ _*📕हवाला- नूई शरीफ, पेज नं. 221*_ _*✒️पाँचवा सुबूत:- मुल्ला अली कारी लिखते हैं कि हमारे अइम्मये कराम हजरत इमामे आज़म अबू हनी...

*اِستغاثہ اور دُعا میں بنیادی فرق:-*

*اِستغاثہ اور دُعا میں بنیادی فرق:-* دُکھ، درد اور تکلیف میں کسی سے مدد طلب کرنا اِستغاثہ کہلاتا ہے، جبکہ مطلقاً پُکارنا دُعا کہلاتا ہے، اِس میں دُکھ، درد، مصیبت اور تکلیف کی شرط نہیں۔ دُعا اور اِستغاثہ میں عموم و خصوص مطلق کی نسبت ہے، کیونکہ دُعا مطلق پکارنے کو کہتے ہیں جبکہ اِستغاثہ کے لئے شرط ہے کہ مصیبت یا تکلیف میں پکاراجائے، اِس لئے ہر اِستغاثہ تو دُعا ہے لیکن ہر دُعا اِستغاثہ نہیں ہے۔ اِستغاثہ اور دُعا میں یہی بنیادی فرق ہے۔- *کلامِ باری تعالیٰ میں لفظِ دُعا کا اِستعمال:-* ذیل میں دُعا کا قرآنی تصوّر واضح کرنے کے لئے اُن میں سے چند اہم معانی کا ذِکر کیا جا رہا ہے - *1. النِّدَآءُ :-  وَ مَثَلُ الَّذِيْنَ کَفَرُوْا کَمَثَلِ الَّذِيْ يَنْعِقُ بِمَا لَا يَسْمَعُ الَّا دُعَآءً وَّ نِدَآءً.  *(البقره، 2 : 171)* اور ان کافروں (کو ہدایت کی طرف بلانے) کی مثال ایسے شخص کی سی ہے جو کسی ایسے (جانور) کو پکارے جو سوائے پکار اور آواز کے کچھ نہیں سنتا۔  قرآنِ مجید میں اللہ تعالیٰ نے آنحضرت صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم کے ادب و تعظیم پر رَغبت دلاتے ہوئے فرمایا :- لَا تَجْعَلُوْا دُعَآء...

دعا صرف عبادت نہیں دعوت بھی ہیں پکار بھی ہیں

*ولاتدع مع اللہ کا صحیح مفہوم:- قرآن حکیم میں لفظِ دُعا کے معانی :-* *قرآن حکیم میں لفظ دُعا تین مختلف معانی میں استعمال ہوا ہے جو درج ذیل ہیں :-* *1۔ دُعا بمعنی دعوت* (Invitation) *2۔ دعا بمعنی التجا* (Supplication) *3۔ دُعا بمعنی عبادت* (Worship) اب ہم بالترتیب مذکورہ بالا تینوں معانی کی مثالیں قرآنِ حکیم سے پیش کرتے ہیں- *(1) دُعا بمعنی دعوت:-* قُلْ هَـذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللّهِ عَلَى بَصِيرَةٍ أَنَاْ وَمَنِ اتَّبَعَنِي وَسُبْحَانَ اللّهِ وَمَا أَنَاْ مِنَ الْمُشْرِكِينَ ’’(اے حبیبِ مکرم!) فرما دیجئے : یہی میری راہ ہے میں اﷲ کی طرف بلاتا ہوں، پوری بصیرت پر (قائم) ہوں، میں (بھی) اور وہ شخص بھی جس نے میری اتباع کی، اور اﷲ پاک ہے اور میں مشرکوں میں سے نہیں ہوں۔‘‘ *يوسف، 12 : 108* ********************* . ادْعُ إِلَى سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ. ’’(اے رسولِ معظّم!) آپ اپنے رب کی راہ کی طرف حکمت اور عمدہ نصیحت کے ساتھ بلائیے۔‘‘ *النحل، 16 : 125* ********************** . وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ. ’’اور ہم نے انہیں (دوزخیوں کا)...