गुस्ताख़े रसूल का हुक्म

 *गुस्ताख़े रसूल का हुक्म*

हदीस शरीफ़,हज़रत अली रज़ीअल्लाहु तआला अन्ह से रिवायत है कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जो नबियों को गाली दे उसे क़त्ल कर दिया जाए और जो मेरे सहाबियों को गाली दे उसे कोड़ा लगाया जाए, 📚 जामेअ् सग़ीर जिल्द 2, सफ़ह 608) ब हवाला तिबरानी फ़िल कबीर)

हज़रत हुसैन बिन अली रज़ीअल्लाहु तआला अन्ह अपने वालिद हज़रत अली रज़ीअल्लाहु तआला अन्ह से रावी हैं कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि

जो किसी नबी को गाली दे उसको क़त्ल करदो और जो मेरे सहाबा को गाली दे (उसे) मारो, 📚 फ़तावा ख़ैरियह जिल्द 1, सफ़ह 102)

तनवीरुल अबसार में है

मुर्तद हो जाने वाले हर मुसलमान की तौबा मक़बूल है मगर किसी नबी को गाली दे कर मुर्तद हो जाने वाले काफ़िर की तौबा मक़बूल नहीं,📚 तनवीरुल अबसार जिल्द 3, सफ़ह 317)

साहिबे दुरर ने बज़ाज़ियह से नक़ल करके और इब्ने सहनून मालिकी ने फ़रमाया

जुमला अहले इस्लाम का इज्मा है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम को बुरा कहने वाला काफ़िर है और उसका हुक्म यह है कि उसे क़त्ल कर दिया जाए और जो उसके मुस्तहिक़े अज़ाब होने में शक करे काफ़िर है,

📚 रद्दुल मुख़्तार जिल्द 3 सफ़ह 317)

फ़रीदुद्दहर वहीदुल असर अल्लामा त़ाहिर बिन अहमद बिन रशीद अलैहिर्रहमतू वर्रिज़वान फ़रमाते हैं के मुहीत में है जिसने नबी ए करीम सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम को गाली दी या उनकी शान में तौहीन की या दीनी मुआमलात में उन्हें ऐब लगाया या खुद उनको अपनी शख़्सियत या उनके किसी वस्फ़ में लगाया तो वो काफ़िर हो गया ख़्वाह गाली देने वाला उम्मते मुहम्मद सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम से हो या उनके अलावा किताबी हो या ग़ैर किताबी ज़िम्मी हो या हर्बी और गाली या तौहीन व ऐब क़सदन (जानबूझकर) सादिर हो या सहवन (भूलकर) या ग़फ़लत में या जल्द बाज़ी में या मज़ाक़ में बहर सूरत (गाली देने वाला) ऐसा दाइमी काफ़िर होगा कि अगरचे तौबा करे मगर उसके बावुजूद उसके तौबा पर ऐतमाद करके उसे बाक़ी नहीं रखा जाएगा बल्कि उसके क़त्ल का ही हुक्म दिया जाएगा,📚 ख़ुलासतुल फ़तावा जिल्द 4, सफ़ह 386)

मवाहिबुल्लदुनिया में है कि

जो शख़्स रसूलल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम को गाली दे या उनकी तन्क़ीसे शान करे उसे बिल इज्मा क़त्ल किया जाएगा,📚 मवाहिबुल्लदुनिया जिल्द 5, सफ़ह 315)

📗 बदमज़हबों से मेलजोल सफ़ह 39---40---41--42)

*हुज़ूर की मुहब्बत दुनिया जहान से ज़्यादा होना शर्ते नजात*

तुम्हारा रब अज़्ज़ा व जल्ल फ़रमाता है👇

तर्जमा----- ऐ नबी, तुम फ़रमा दो के ऐ लोगों, अगर तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीबियां, तुम्हारा कुन्बा, तुम्हारी कमाई के माल और वह सौदागरी जिसके नुक़सान का तुम्हें अंदेशा है और तुम्हारी पसंद के मकान, इनमें कोई चीज़ भी अगर तुमको अल्लाह और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम) और उसकी राह में कोशिश करने से ज़्यादा महबूब है तो इंतजार रखो यहां तक के अल्लाह अपना अज़ाब उतारे और अल्लाह तआला बे हुक्मो को राह नहीं देता,

📚 पारा 10, रुकू 9, सूरह तौबा,

इस आयत से मालूम हुआ के जिसे दुनिया जहान में कोई मुअज़्ज़ज़, कोई अज़ीज़ कोई माल कोई चीज़ अल्लाह व रसूल से ज़्यादा महबूब हो वह बारगाहे इलाही से मरदूद है, अल्लाह उसे अपनी तरफ़ राह ना देगा, उसे अजाबे इलाही के इंतजार में रहना चाहिए,

والعياذ بلله تعالى,

तुम्हारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम फ़रमाते हैं👇

तुम में कोई मुसलमान ना होगा जब तक मैं उसे उसके मां-बाप औलाद और सब आदमियों से ज़्यादा प्यारा ना होऊं,

صلى الله تعالى عليه وسلم،

📚 बुखारी बाब हुब्बे रसूल सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम, मन उल ईमान, 1/7)

यह हदीस सही बुखारी व सही मुस्लिम में अनस इब्ने मालिक अंसारी रज़िअल्लाहू तआला अन्ह से है,इसने तो यह बात साफ़ फ़रमा दी के जो हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम से ज़्यादा किसी को अज़ीज़ रखे हरगिज़ मुसलमान नहीं,

मुसलमानों कहो मुहम्मदुर्रसूलल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम को तमाम जहान से ज़्यादा महबूब रखना मदारे ईमान व मदारे नजात हुआ या नहीं,

कहो हुआ और ज़रूर हुआ,यहां तक तो सारे कल्मा गो खुशी-खुशी कुबूल कर लेंगे के हां हमारे दिल में मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम की अज़ीम अज़मत है,हां हां, मां-बाप, औलाद सारे जहान से ज़्यादा हमें हुज़ूर की मुहब्बत है, भाइयो ख़ुदा ऐसा ही करे, 

📗 तमहीदे ईमान, शरीफ़ सफ़ह 28--29)

प्यारे मुसलमानों अगर दुनिया भर में इस्लामी हुकूमत होती तो आज एक भी गुस्ताख़ पैदा नहीं होता क्योंकि उसका सर काट दिया जाता लिहाज़ा ऐसे हालात में हुज़ूर अलैहिस्सलाम से सच्ची मुहब्बत का तक़ाज़ा यही है कि हमें गुस्ताख़े रसूल का बायकॉट करना है उनसे दूर रहना है नमाज़ रोज़ा को वक़्त पर अदा करना है और शरिअत की मुकम्मल पाबंदी करना है यानी हुज़ूर अलैहिस्सलाम की हर सुन्नत को अदा करना है, जबही हम सच्चे आशिक़े रसूल होंगे, अगर हम ऐसा नहीं कर सके तो ऊपर ज़िक्र की गई आयते करीमा में जो बताया गया कि हमें अज़ाबे इलाही का इंतजार करना चाहिए, के कब अज़ाबे इलाही आजाए और हमे बर्बाद कर डाले, इससे पहले हमें अपने तमाम गुनाहों से तौबा करके हुज़ूर अलैहिस्सलाम का सच्चा आशिक बन जाना चाहिए, और उनके दुश्मनों गुस्ताख़ों का बायकॉट करना चाहिए,,

*🌹तालिबे दुआ 🤲👇*

हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद ज़ुल्फ़ुक़ार ख़ान नईमी साहब क़िब्ला व हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद क़ासिम रज़ा नईमी साहब क़िब्ला और ग़ुलामे ताजुश्शरिअह अब्दुल्लाह रज़वी क़ादरी, मुरादाबाद यूपी भारत,

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