तमहीदे ईमान, क़िस्त 27* *हुज़ूर का इल्मे ग़ैब अताई है*
*तमहीदे ईमान, क़िस्त 27*
*हुज़ूर का इल्मे ग़ैब अताई है*
प्यारे मुसलमानों जैसा के आपने गुज़िश्ता मैसेज में मुलाहिज़ा किया होगा के हुज़ूर अलैहिस्सलाम के इल्मे ग़ैब का इन्कार करने वालों को अल्लाह तआला ने अल्लाह व क़ुरआन व रसूल से ठिट्ठा (हंसी मज़ाक) करने वाला और साफ़ साफ़ काफ़िर व मुर्तद ठहराया और क्यों ना हो के ग़ैब की बात जाननी शाने नबूव्वत है,जैसा के इमाम हुज्जतुल इस्लाम मुहम्मद ग़ज़ाली व इमाम अहमद क़स्तलानी व मौलाना अली क़ारी व अल्लामा मुहम्मद ज़रक़ानी वगैरहुम अकाबिर ने तशरीह फरमाई जिसकी तफ़सील रसाइले इल्मे ग़ैब में बफ़ज़लेही तआला बर वजहे आला (मुकम्मल तौर पर) मज़कूर हुई फिर उसकी सख्त शामत, कमाले ज़लालत (गुमराही) का क्या पूछना जो ग़ैब की एक बात भी ख़ुदा के बताए से भी नबी को मालूम होना मुहाल व ना मुमकिन बताता है उसके नज़दीक अल्लाह से सब चीज़ें गायब हैं और अल्लाह को इतनी क़ुदरत नहीं के किसी को एक ग़ैब का इल्म दे सके,, अल्लाह तआला शैतान के धोकों से पनाह दे, आमीन,
हां बे ख़ुदा के बताए किसी को ज़र्रा भर का इल्म मानना ज़रूर कुफ्र है और जमीअ् मालूमाते इलाहिया को इल्मे मखलूक का मुहीत होना भी बातिल और अक्सर उल्मा के ख़िलाफ़ है लेकिन रोज़े अज़ल (पहले दिन) से रोज़े आखिर तक का,
ما كان وما يكون،
मा काना वमा यकून, (जो हुआ और जो होगा)
अल्लाह तआला के मालूमात से वह निस्बत भी नहीं रखता जो एक ज़र्रा के लाखवें करोड़वें हिस्से बराबरतरी को करोड़हा करोड़ समुंदरों से हो बल्के यह खुद उलूमे मुहम्मदिया सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम का एक छोटा सा टुकड़ा है, इन तमाम उमूर की तफ़सील,
📗 अद्दौलतुल मक्कियह, वगैरहा में है,
खैर यह तो जुमला मुअतरेज़ा (ऐसी बात जो बीच में आरज़ी तौर पर हो) था और इन्शाअल्लाहुल अज़ीम बहुत मुफीद (फ़ायदा मंद) था, अब बहस साबिक़ की तरफ़ ऊद कीजिए, (यानी अब पिछली बहस की तरफ़ लौटिए)
इस फ़िर्क़ा ए बातिला (वहाबी देवबंदी अहले हदीस तब्लीग़ियों) का मकरे दोम (दूसरा धोका) यह है के इमामे आज़म रज़िअल्लाहू तआला अन्ह का मज़हब है के
لا نكفر احدا من اهل القبله،
हम अहले क़िब्ला में से किसी को काफ़िर नहीं कहते और हदीस में है जो हमारी नमाज़ पढ़े और हमारे क़िब्ला को मुंह करे और हमारा ज़बीहा खाए वह मुसलमान है,
मुसलमानों इस मकरे खबीस में उन लोगों ने निरी कलमा गोई से उदूल (इन्कार) करके सिर्फ़ क़िब्ला रूई का नाम ईमान रख दिया यानी जो क़िब्ला रू होकर नमाज़ पढ़े, मुसलमान हैं अगरचे अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल को झूटा कहे, मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम को गालियां दे, किसी सूरत किसी तरह ईमान नहीं टलता,
ع. چوں وضوے محکم بی بی تمیز،،
अव्वलन इस मकर का जवाब👇
तुम्हारा रब अज़्ज़ा व जल्ल फरमाता है
ليس البر ان تولوا وجوهكم قبل المشرق والمغرب ولكن البر من امن بالله واليوم الاخر و الملائكة والنبين،
तर्जमा----- असल नेकी यह नहीं है के अपना मुंह नमाज़ में पूरब या पछां को करो बल्के असल नेकी यह है के आदमी ईमान लाए अल्लाह और क़यामत और फरिश्तों और क़ुरआन और तमाम अम्बिया पर,
📚 पारा 2, रुकू 6, सूरह बक़र)
देखो साफ़ फ़रमा दिया के जरूरियाते दीन पर ईमान लाना ही असल कार है बगैर उसके नमाज़ में क़िब्ला को मुंह करना कोई चीज़ नहीं,
और फरमाता है👇
तर्जमा----- वह जो खर्च करते हैं उसका कुबूल होना बंद ना हुआ मगर इसलिए के उन्होंने अल्लाह और रसूल के साथ कुफ्र किया और नमाज़ को नहीं आते मगर जी हारे और खर्च नहीं करते मगर बुरे दिल से,
📚 पारा 10, सूरह तौबा, रुकू 13, आयत 54)
देखो उनका नमाज़ पढ़ना बयान किया और फिर उन्हें काफ़िर फ़रमाया क्या वह क़िब्ला को नमाज़ नहीं पढ़ते थे?
फ़क़त क़िब्ला कैसा, क़िब्ला ए दिल व जान, कअबा ए दीनो ईमान, सरवरे आलमयां (तमाम आलम के बादशाह) सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम के पीछे जानिबे क़िब्ला (यानी कअबा की तरफ़ मुंह करके) नमाज़ पढ़ते थे, (फिर भी रब अज़्ज़ा व जल्ल ने उनको काफ़िर बताया)
और फरमाता है👇
तर्जमा----- फिर अगर वह तौबा करें और नमाज़ बरपा रखें और ज़कात दें तो हमारे दीनी भाई हैं और हम पता की बात साफ़ बयान करते हैं इल्म वालों के लिए और अगर क़ौल व इक़रार करके फिर अपनी क़समें तोड़ें और तुम्हारे दीन पर तअन करें तो कुफ्र के पेशवाओं से लड़ो उनकी क़समें कुछ नहीं शायद वह बाज़ आएं,
📚 पारा 10, सरह तौबा, रुकू 8)
देखो नमाज़ रोज़ा ज़कात वाले अगर दीन पर तअना करें तो उन्हें कुफ्र का पेशवा काफिरों का सरगना फ़रमाया,
क्या ख़ुदा और रसूल की शान में वह गुस्ताखियां (जो वहाबी देवबंदी तब्लीग़ी मोलवियों ने अपनी किताबो में लिखीं) दीन पर तअना नहीं इसका बयान भी सुनिए
तुम्हारा रब अज़्ज़ा व जल्ल फ़रमाता है👇
तर्जमा----- कुछ यहूदी बात को उसकी जगह से बदलते हैं और कहते हैं हमने सुना और ना माना और सुनिए आप सुनाए ना जाएं और राइना कहते हैं ज़बान फेर कर और दीन पर तअना करने को और अगर वह कहते, हम ने सुना और माना और सुनिए और हमें मोहलत दीजिए तो उनके लिए बेहतर और बहुत ठीक होता लेकिन उनके कुफ्र के सबब अल्लाह ने उन पर लानत की है तो ईमान नहीं लाते मगर कम,
📚 पारा 5, सूरह निसा रुकू 4)
कुछ यहूदी जब दरबारे नबूव्वत में हाज़िर होते और हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम से कुछ अर्ज़ करना चाहते तो यू कहते सुनिए आप सुनाए ना जाएं जिससे ज़ाहिर तो दुआ होती यानी हुज़ूर को कोई ना गवार बात ना सुनाते और दिल में बद्दुआ का इरादा करते के सुनाई ना दे और जब हुजूरे अक़दस सल्लल्लाहू तआला अलैही वसल्लम कुछ इरशाद फरमाते और (कुछ लोग) यह बात समझ लेने के लिए मोहलत चाहते तो राईना कहते जिसका एक पहलू ए ज़ाहिर यह है के हमारी रियायत फ़रमाइये और मुराद ख़फ़ी (छुपी हुई) रखते रऊनत वाला और बअज़ कहते हैं ज़बान दबाकर राईना कहते यानी हमारा चरवाहा, (यानी मुनाफ़िक़ीन दिल ही दिल में हुज़ूर के लिए राइना वाला लफ़्ज़ (शब्द) तौहीन के तौर पर इस्तेमाल करते)
जब पहलू दार (यानी जिस बात के कई मअना हों उनमें एक मअना तौहीन वाला हो तो वह) बात दीन में तअना हुई तो सरीह (खुली हुई) व साफ़ कितना सख्त तअना होगी बल्के इंसाफ़ कीजिए तो उन बातों का सरीह भी उन कलिमात की शनाअत को नहीं पहुंचता,, बहरा होने की दुआ या रऊनत या बकरियां चराने की तरफ़ निस्बत को उन अल्फ़ाज़ से क्या निस्बत के शैतान से इल्म में कमतर या पागलों चौपायों से इल्म में हमसर (बराबर) और ख़ुदा की निस्बत वह के झूटा है झूट बोलता है और जो उसे झूटा बताए मुसलमान सुन्नी सालेह है......
والعیاذ باللہ رب العالمین،
(यानी जब मुनाफ़िक़ हुज़ूर अलैहिस्सलाम को राईना के लफ़्ज़ से पुकारते जिसका मअना वह लोग तौहीन मुराद लिया करते थे तो अल्लाह तआला ने उनको काफ़िर बताया और उन पर लानत की, ज़रा सोचिए के वहाबी देवबंदी अहले हदीस तब्लीग़ियों के मौलवियों ने तो उनसे भी बढ़कर हुज़ूर अलैहिस्सलाम की शान में गुस्ताखियां लिखीं हैं थानवी ने कहा के हुजूर के इल्म जैसा तो जानवरों पागलों बच्चों को भी है और ख़लील अम्बेठवी ने कहा हुजूर के इल्म से ज्यादा शैतान का इल्म है, जैसा के आप गुज़रे हुए मैसेज में मुलाहिज़ा कर चुके तो क्या यह लोग और उनके मानने वाले अब भी सुन्नी सहीहुल अक़ीदा मुसलमान हो सकते हैं, नहीं और हरगिज़ नहीं)
सानियन इस वहमे शनीअ् (बुरा वहम) को मज़हबे सैय्यदना इमामे आज़म रज़िअल्लाहू तआला अन्ह बताना हज़रत इमाम पर सख़्त इफ़्तरा व इत्तेहाम (तोहमत) है,
(यानी वहाबी देवबंदी अहले हदीस मौलवियों ने यह जो कहा के इमामे आज़म का मज़हब है के जो क़िब्ला रू होकर नमाज़ पढ़े और हमारा ज़बीहा खाए वह मुसलमान है, अगरचे अल्लाह को झूटा कहे और रसूल को गालियां दे तौहीन करे,, यह वहाबियों का अपने जाल में फसाने के लिए इमामे आज़म का सहारा लेकर मुसलमानों को धोका देना है और इमामे आज़म अबू हनीफा रज़िअल्लाहु तआला अन्ह पर इल्ज़ाम है)
📗 तमहीदे ईमान शरीफ़ सफ़ह 52---53---54---55)
मतबूआ क़ादरी किताब घर इस्लामिया मार्केट बरेली शरीफ़,
Next........
*🌹 तालिबे दुआ 🤲👇*
हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद ज़ुल्फ़ुक़ार ख़ान नईमी साहब क़िब्ला व हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद क़ासिम रज़ा नईमी साहब क़िब्ला और ग़ुलामे ताजुश्शरिअह अब्दुल्लाह रज़वी क़ादरी, मुरादाबाद यूपी इंडिया,
*📗 7.फ़ैज़ने ग़ौसे आज़म 📘*
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