सूरए अनआम – पाँचवा रूकू* *ILAM GAIYAB KE INKAR KI HIKMAT*
*सूरए अनआम – पाँचवा रूकू*
*ILAM GAIYAB KE INKAR KI HIKMAT*
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला और बेशक हमने तुमसे पहली उम्मतों की तरफ़ रसूल भेजे तो उन्हें सख़्ती और तकलीफ़ से पकड़ा(1)कि वो किसी तरह गिड़गिड़ाएं(2)(42)तो क्यों न हुआ कि जब उनपर अज़ाब आया तो गिड़गिड़ाए होते लेकिन दिल तो सख़्त हो गए (3)और शैतान ने उनके काम निगाह में भले कर दिखाए (43) फिर जब उन्होंने भुला दिया जो नसीहतें उनको की गईं थीं (4)हमने उनपर हर चीज़ के दर्वाज़े खोल दिये (5)यहाँ तक कि जब ख़ुश हुए उसपर जो उन्हें मिला (6)तो हमने अचानक उन्हें पकड़ लिया (7) अब वो आस टूटे रह गए (44) तो जड़ काट दी गई ज़ालिमों की (8)और सब ख़ूबियों सराहा अल्लाह रब सारे संसार का (9) (45)तुम फ़रमाओ भला बताओ तो अगर अल्लाह तुम्हारे कान और आँख ले ले और तुम्हारे दिलों पर मोहर कर दे (10) तो अल्लाह के सिवा कौन ख़ुदा है कि तुम्हें यह चीज़ ला दे (11)देखो हम किस किस रंग से आयतें बयान करते हैं फिर वो मुंह फेर लेते हैं (46) तुम फ़रमाओ भला बताओ तो अगर तुम पर अल्लाह का अज़ाब आए अचानक (12) या खुल्लमखुल्ला (13)तो कौन तबाह होगा सिवा ज़ालिमों के (14) (47)और हम नहीं भेजते रसूलों को मगर ख़ुशी और डर सुनाते (15)तो जो ईमान लाए और संवरे (16) उनको न कुछ डर न कुछ ग़म (48) और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई उन्हें अज़ाब पहुंचेगा बदला उनकी बेहुक्मी का (49) तुम फ़रमा दो मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं और न यह कहूं कि मैं आप ग़ैब जान लेता हूँ और न तुमसे यह कहूं कि मैं फ़रिश्ता हूँ (17)मैं तो उसीका ताबे (अधीन) हूँ जो मुझे वही आती है (18)तुम फ़रमाओ क्या बराबर हो जाएंगे अंधे और अंखियारे (19)तो क्या तुम ग़ौर नहीं करते (50) *तफ़सीर अनआम – पाँचवा रूकू* (1) दरिद्रता, ग़रीबी और बीमारी वग़ैरह में जकड़ा (2) अल्लाह की तरफ़ रूजू करें, अपने गुनाहों से बाज़ आएं.(3) वो अल्लाह की बारगाह में तौबा करने, माफ़ी मांगने के बजाय कुफ़्र और झुटलाने पर अड़े रहे.(4) और वो किसी तरह नसीहत लेने को तैयार न हुए, न पेश आई मुसीबतों से, न नबियों के उपदेशों से.(5) सेहत व सलामती और रिज़्क़ में बढ़ौतरी और आराम वग़ैरह के.(6) और अपने आपको उसका हक़दार समझने और क़ारून की तरह घमण्ड करने लगे.(7) और अज़ाब में जकड़ा (8) और सब के सब हलाक कर दिये गए, कोई बाक़ी न छोड़ा गया (9) इससे मालूम हुआ कि गुमराहों, बेदीनों और ज़ालिमों की हलाकत अल्लाह तआला की नेअमत है, इस पर शुक्र करना चाहिये (10) और इल्म व मअरिफ़त का निज़ाम दरहम बरहम हो जाए.(11) इसका जवाब यही है कि कोई नहीं. तो अब तौहीद यानी अल्लाह के एक होने पर दलील क़ायम हो गई कि जब अल्लाह के सिवा कोई इतनी क़ुदरत और अधिकार वाला नहीं तो इबादत का हक़दार सिर्फ़ वही है और शिर्क बहुत बुरा ज़ुल्म और जुर्म है.(12) जिसके नशान और चिन्ह पहले से मालूम न हों.(13)आँखों देखते.(14) यानी काफ़िरों के, कि उन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया और यह हलाकत उनके हक़ में अज़ाब है.(15) ईमानदारों को जन्नत व सवाब की बशारतें देते और काफ़िरों को जहन्नम व अज़ाब से डराते.(16) नेक अमल करें.(17) काफ़िरों का तरीक़ा था कि वो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से तरह तरह के सवाल किया करते थे. कभी कहते कि आप रसूल हें तो हमें बहुत सी दौलत और माल दीजिये कि हम कभी मोहताज न हों. हमारे लिये पहाड़ों को सोना कर दीजियें. कभी कहते कि पिछली और आगे की ख़बरें सुनाइये और हमें हमारे भविष्य की ख़बर दीजिये, क्या क्या होगा ताकि हम मुनाफ़ा हासिल करें और नुक़सान से बचने के लिये पहले से प्रबन्ध कर लें. कभी कहते, हमें क़यामत का वक़्त बताइये कब आएगी.कभी कहते आप कैसे रसूल हैं जो खाते पीते भी हैं, निकाह भी करते हैं. उनकी इन तमाम बातों का इस आयत में जवाब दिया गया कि यह कलाम निहायत बेमहल और जिहालत का है. क्योंकि जो व्यक्ति किसी बात का दावा करे उससे वही बातें पूछी जा सकती हैं जो उसके दावे से सम्बन्धित हों. ग़ैर ज़रूरी बातों का पूछना और उनको उस दावे के खिलाफ़ तर्क बनाना अत्यन्त दर्जें की जिहालत और अज्ञानता है. इसलिये इरशाद हुआ कि आप फ़रमा दीजिये कि मेरा दावा यह तो नहीं कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं जो तुम मुझ से माल दौलत का सवाल करो और उसकी तरफ़ तवज्जह न करूं तो नबुव्वत का इनकार करदा. न मेरा दावा ज़ाती ग़ैब दानी का है कि अगर मैं तुम्हें पिछली या आयन्दा की ख़बरें न बताऊं तो मेरी रिसालत मानने में उज़्र कर सको. न मैंने फ़रिश्ता होने का दावा किया है कि खाना पीना निकाह करना ऐतिराज़ की बात हो. तो जिन चीज़ों का दावा ही नहीं किया उनका सवाल बेमहल और उसका जवाब देना मुझपर लाज़िम नहीं. मेरा दावा नबुव्वत और रिसालत का है और जब उस पर ज़बरदस्त दलीलें और मज़बूत प्रमाण क़ायम हो चुके तो ग़ैर मुतअल्लिक़ बातें पेश करना क्या मानी रखता है. इस से साफ़ स्पष्ट हो गया कि इस आयत को सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ग़ैब पर सूचित किये जाने की नफ़ी के लिये तर्क बनाना ऐसा ही बेमहल है जैसा काफ़िरों का इन सवालों को नबुव्वत के इन्कार की दस्तावेज़ बनाना बेमहल था. इसके अलावा इस आयत से हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अता किये गए इल्म का इन्कार किसी तरह मुराद ही नहीं हो सकता क्योंकि उस सूरत में आयतों के बीच टकराव और परस्पर विरोध का क़ायल होना पड़ेगा जो ग़लत है. मुफ़स्सिरों का यह भी कहना है कि हुज़ूर का “ला अक़ूलो लकुम.” फ़रमाना विनम्रता के रूप में है. *(ख़ाज़िन, मदारिक व जुमल वग़ैरह)* (18) और यही नही का काम है. तो मैं तुम्हें वही दूंगा जिसकी मुझे इजाज़त होगी, वही करूंगा जिसका मुझे हुक्म मिला हो.(19) मूमिन व काफ़िर, आलिम व जाहिल.
*ILAM GAIYAB KE INKAR KI HIKMAT*
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला और बेशक हमने तुमसे पहली उम्मतों की तरफ़ रसूल भेजे तो उन्हें सख़्ती और तकलीफ़ से पकड़ा(1)कि वो किसी तरह गिड़गिड़ाएं(2)(42)तो क्यों न हुआ कि जब उनपर अज़ाब आया तो गिड़गिड़ाए होते लेकिन दिल तो सख़्त हो गए (3)और शैतान ने उनके काम निगाह में भले कर दिखाए (43) फिर जब उन्होंने भुला दिया जो नसीहतें उनको की गईं थीं (4)हमने उनपर हर चीज़ के दर्वाज़े खोल दिये (5)यहाँ तक कि जब ख़ुश हुए उसपर जो उन्हें मिला (6)तो हमने अचानक उन्हें पकड़ लिया (7) अब वो आस टूटे रह गए (44) तो जड़ काट दी गई ज़ालिमों की (8)और सब ख़ूबियों सराहा अल्लाह रब सारे संसार का (9) (45)तुम फ़रमाओ भला बताओ तो अगर अल्लाह तुम्हारे कान और आँख ले ले और तुम्हारे दिलों पर मोहर कर दे (10) तो अल्लाह के सिवा कौन ख़ुदा है कि तुम्हें यह चीज़ ला दे (11)देखो हम किस किस रंग से आयतें बयान करते हैं फिर वो मुंह फेर लेते हैं (46) तुम फ़रमाओ भला बताओ तो अगर तुम पर अल्लाह का अज़ाब आए अचानक (12) या खुल्लमखुल्ला (13)तो कौन तबाह होगा सिवा ज़ालिमों के (14) (47)और हम नहीं भेजते रसूलों को मगर ख़ुशी और डर सुनाते (15)तो जो ईमान लाए और संवरे (16) उनको न कुछ डर न कुछ ग़म (48) और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई उन्हें अज़ाब पहुंचेगा बदला उनकी बेहुक्मी का (49) तुम फ़रमा दो मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं और न यह कहूं कि मैं आप ग़ैब जान लेता हूँ और न तुमसे यह कहूं कि मैं फ़रिश्ता हूँ (17)मैं तो उसीका ताबे (अधीन) हूँ जो मुझे वही आती है (18)तुम फ़रमाओ क्या बराबर हो जाएंगे अंधे और अंखियारे (19)तो क्या तुम ग़ौर नहीं करते (50) *तफ़सीर अनआम – पाँचवा रूकू* (1) दरिद्रता, ग़रीबी और बीमारी वग़ैरह में जकड़ा (2) अल्लाह की तरफ़ रूजू करें, अपने गुनाहों से बाज़ आएं.(3) वो अल्लाह की बारगाह में तौबा करने, माफ़ी मांगने के बजाय कुफ़्र और झुटलाने पर अड़े रहे.(4) और वो किसी तरह नसीहत लेने को तैयार न हुए, न पेश आई मुसीबतों से, न नबियों के उपदेशों से.(5) सेहत व सलामती और रिज़्क़ में बढ़ौतरी और आराम वग़ैरह के.(6) और अपने आपको उसका हक़दार समझने और क़ारून की तरह घमण्ड करने लगे.(7) और अज़ाब में जकड़ा (8) और सब के सब हलाक कर दिये गए, कोई बाक़ी न छोड़ा गया (9) इससे मालूम हुआ कि गुमराहों, बेदीनों और ज़ालिमों की हलाकत अल्लाह तआला की नेअमत है, इस पर शुक्र करना चाहिये (10) और इल्म व मअरिफ़त का निज़ाम दरहम बरहम हो जाए.(11) इसका जवाब यही है कि कोई नहीं. तो अब तौहीद यानी अल्लाह के एक होने पर दलील क़ायम हो गई कि जब अल्लाह के सिवा कोई इतनी क़ुदरत और अधिकार वाला नहीं तो इबादत का हक़दार सिर्फ़ वही है और शिर्क बहुत बुरा ज़ुल्म और जुर्म है.(12) जिसके नशान और चिन्ह पहले से मालूम न हों.(13)आँखों देखते.(14) यानी काफ़िरों के, कि उन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया और यह हलाकत उनके हक़ में अज़ाब है.(15) ईमानदारों को जन्नत व सवाब की बशारतें देते और काफ़िरों को जहन्नम व अज़ाब से डराते.(16) नेक अमल करें.(17) काफ़िरों का तरीक़ा था कि वो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से तरह तरह के सवाल किया करते थे. कभी कहते कि आप रसूल हें तो हमें बहुत सी दौलत और माल दीजिये कि हम कभी मोहताज न हों. हमारे लिये पहाड़ों को सोना कर दीजियें. कभी कहते कि पिछली और आगे की ख़बरें सुनाइये और हमें हमारे भविष्य की ख़बर दीजिये, क्या क्या होगा ताकि हम मुनाफ़ा हासिल करें और नुक़सान से बचने के लिये पहले से प्रबन्ध कर लें. कभी कहते, हमें क़यामत का वक़्त बताइये कब आएगी.कभी कहते आप कैसे रसूल हैं जो खाते पीते भी हैं, निकाह भी करते हैं. उनकी इन तमाम बातों का इस आयत में जवाब दिया गया कि यह कलाम निहायत बेमहल और जिहालत का है. क्योंकि जो व्यक्ति किसी बात का दावा करे उससे वही बातें पूछी जा सकती हैं जो उसके दावे से सम्बन्धित हों. ग़ैर ज़रूरी बातों का पूछना और उनको उस दावे के खिलाफ़ तर्क बनाना अत्यन्त दर्जें की जिहालत और अज्ञानता है. इसलिये इरशाद हुआ कि आप फ़रमा दीजिये कि मेरा दावा यह तो नहीं कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं जो तुम मुझ से माल दौलत का सवाल करो और उसकी तरफ़ तवज्जह न करूं तो नबुव्वत का इनकार करदा. न मेरा दावा ज़ाती ग़ैब दानी का है कि अगर मैं तुम्हें पिछली या आयन्दा की ख़बरें न बताऊं तो मेरी रिसालत मानने में उज़्र कर सको. न मैंने फ़रिश्ता होने का दावा किया है कि खाना पीना निकाह करना ऐतिराज़ की बात हो. तो जिन चीज़ों का दावा ही नहीं किया उनका सवाल बेमहल और उसका जवाब देना मुझपर लाज़िम नहीं. मेरा दावा नबुव्वत और रिसालत का है और जब उस पर ज़बरदस्त दलीलें और मज़बूत प्रमाण क़ायम हो चुके तो ग़ैर मुतअल्लिक़ बातें पेश करना क्या मानी रखता है. इस से साफ़ स्पष्ट हो गया कि इस आयत को सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ग़ैब पर सूचित किये जाने की नफ़ी के लिये तर्क बनाना ऐसा ही बेमहल है जैसा काफ़िरों का इन सवालों को नबुव्वत के इन्कार की दस्तावेज़ बनाना बेमहल था. इसके अलावा इस आयत से हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अता किये गए इल्म का इन्कार किसी तरह मुराद ही नहीं हो सकता क्योंकि उस सूरत में आयतों के बीच टकराव और परस्पर विरोध का क़ायल होना पड़ेगा जो ग़लत है. मुफ़स्सिरों का यह भी कहना है कि हुज़ूर का “ला अक़ूलो लकुम.” फ़रमाना विनम्रता के रूप में है. *(ख़ाज़िन, मदारिक व जुमल वग़ैरह)* (18) और यही नही का काम है. तो मैं तुम्हें वही दूंगा जिसकी मुझे इजाज़त होगी, वही करूंगा जिसका मुझे हुक्म मिला हो.(19) मूमिन व काफ़िर, आलिम व जाहिल.
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